प्रक्रिया

आयकर नियम 1962 के अधीन समझौता आवदेन केवल इस हेतु निर्धारित फॉर्म संख्या 34 – बी में ही फाईल किए जाने है।

फॉर्म आवेदक द्वारा हस्ताक्षरित होने चाहिए।

आवदेन ठीक प्रकार से भरा हुआ होना चाहिए। अपूर्ण आवेदन अस्वीकार कर दिया जा सकता है।

आवेदन की स्वीकृति के लिए आवश्यक है कि आवेदन की तिथि तक देय कर की पूरी राशि उस पर देय ब्याज के साथ अदा कर दी गई हो।

आवेदन, व्यक्तिगत रूप में अथवा डाक द्वारा किया जा सकता है।

आवदेक अथवा उसके प्राधिकृत प्रतिनिधि द्वारा व्यक्तिगत रूप से आवेदन किया जा सकता है। आवेदन, को सचिव को संबोधित कर निबंधत डाक द्वारा भी भेजा जा सकता है।

यद्यपि डाक द्वारा भेजे गए आवेदन के लिए, आयोग में आवेदन प्राप्ति की तारीख को आवेदन करने की तारीख माना जाएगा।

आवेदन या तो आयोग के दिल्ली स्थित मुख्यालय के सचिव अथवा जिस अतिरिक्त पीठ के अधिकार – क्षेत्र में वह केस आता है, उसके सचिव को किया जा सकता है।

आयोग द्वारा स्वीकार्य होने के लिए आवदेन के साथ अतिरिक्त कर की अदायगी का प्रमाण साथ में होना चाहिए (आवेदन फाईल करने की तिथि तक धारा 234 ए, 234 बी एवं 234 सी के अधीन देय ब्याज सहित) ।

आवेदन के साथ कर की अदायगी के प्रमाण स्वरूप स्व अभिप्रमाणित चालान एवं अन्य कागजातों की प्रति लगी होनी चाहिए।

समझौता आवेदन व्यक्तिगत रूप से अथवा निबंधित डाक से सचिव अथवा पीठ द्वारा प्राधिकृत अधिकारी, जिसके अधिकार क्षेत्र में वह केस आता है, को प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

डाक द्वारा भेजे गए आवेदन को, आयोग द्वारा प्राप्ति की तारीख को प्रस्तुत हुआ माना जाएगा।

प्राधिकृत प्रतिनिधि भी व्यक्तिगत रूप से आवेदन कर सकता है।

प्राधिकृत प्रतिनिधि से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जो आवेदक द्वारा लिखित रूप से उनकी ओर से उपस्थित होने के लिए प्राधिकृत किया गया होः जोः

ऐसा व्यक्ति जो आवेदक का किसी रूप में रिश्तेदार होः अथवा

आवेदक द्वारा नियोजित किया गया हो, अथवा

किसी अनुसूचित बैंक का अधिकारी जिसमें आवेदक द्वारा चालू खाता का संधारण किया जा रहा हो या

अन्य नियमित लेनदेन होता हो, अथवा

कोई विधि व्यवसायी जो भारत के किसी दीवानी (सिविल) न्यायालय में व्यवसाय करने का हकदार होः, अथवा चार्टर्ड अकाउन्टेन्ट्स अधिनियम 1949 (1949 का 38) के अनुसार अकाडन्टेन्ट (लेखापाल) हो, एवं राज्यों के संदर्भ में, इसमें कंपनी अधिनियम (1956 का 1 ) की धारा 226 की उपधारा (2) के आधार पर ऐसा व्यक्ति जो उस राज्य मे कंपनियों के लेखापाल के रूप में नियुक्त किए जाने का हकदार हो। बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त किसी लेखा परीक्षा को उत्तीर्ण किया हुआ व्यक्ति, अथवा बोर्ड द्वारा नियत शैक्षिक योग्यता को प्राप्त किया हुआ व्यक्ति। यदि आवेदन में उपरोक्त प्रकृति की कोई कमी पाई जाती है तो ऐसी कमी को इंगित करते हुए आवेदन वापस कर दिया जाएगा। यदि आवेदन में ऐसी कोई कमी नहीं पाई जाती है तो आवेदन को पंजिका में अंकित कर लिया जाता है, एवं एक विशिष्ट संख्या (जिसे पंजीकरण संख्या भी कहा जाता है) प्रदान की जाती है एवं आवेदक को इस संबंध में पत्र द्वारा सूचित कर दिया जाता है। इसके पश्चात इस हेतु बनाई गई जांच सूची के अनुसार इसकी बारीकी से जांच की जाती है।

धारा 245 डी(1) के अधीन कार्यवाही के दौरान समझौता आवेदन फाईल करने की तारीख से 14 दिनों के भीतर आयोग द्वारा आवेदन नांमजूर किया जा सकता है।
यदि आवेदन 14 दिनों के भीतर नांमजूर नहीं किया जाता है तो यह मान लिया जाएगा कि इसे मंजूर कर लिया गया है।
आयोग द्वारा आवेदन नांमजूर किया जा सकता है यदि निम्न तीन अनिवार्य शर्तें आवेदक द्वारा पूरी नहीं की जाती हैं-

  1. आयोग के समक्ष अतिरिक्त आयकर प्रकट करना, जो कम से कम रू. 10 लाख हो ( तलाशी और अधिग्रहण मामले में विशिष्ट व्यक्ति के लिए रू. 50 लाख)
  2. आवेदक द्वारा अन्य कोई समझौता आवेदन 1 जून के बाद नहीं किया गया हो, जिसे आगे की कार्यवाही के लिए स्वीकृत कर लिया गया है।
  3. आप जिस निर्धारण वर्ष के लिए आयोग के पास आ रहे है उसके लिए आय़कर प्राधिकारी द्वारा कोई निर्धारण आदेश जारी नहीं किया गया हो एवं उस वर्ष के लिए निर्धारण आदेश जारी करने की वैधानिक समय –सीमा समाप्त नहीं हुई हो

और यह भी कि वह आवेदन जिसके साथ अतिरिक्त कर एवं ब्याज तथा रू 500  की निर्धारित शुल्क की अदायगी का प्रमाण संलग्न नहीं हो, को भी नामंजूर किया जा सकता है।

आवेदन करने की तारीख को , आवेदन की एक प्रति संबंधित आयकर प्राधिकारी को निर्धारित फॉर्म संख्या 34 बी ए में भेजी जानी है, जिसके नहीं भेजे जाने से भी आवेदन नांमजूर किया जा सकता है।

जब आवेदन मंजूर हो जाता है तो धारा 245 (2 बी) के अधीन आयोग द्वारा आयकर आयुक्त की रिपोर्ट मांगी जाती है।

आयुक्त के रिपोर्ट के आधार पर आयोग तुष्ट होकर अथवा आयुक्त द्वारा पत्र प्राप्त किए जाने से 30 दिनों के भीतर यदि आयुक्त की रिपोर्ट प्राप्त नहीं होती है, तो आयोग धारा 245 डी (2 सी) के अधीन एक आदेश पारित कर आवेदन को वैध घोषित कर सकता है।

आयुक्त को दिए गए 30 दिनों की अवधि की समाप्ति से 15 दिनों के भीतर आयोग द्वारा आदेश पारित किया जाना है।

धारा 245 डी (1) के अधीन आवेदन नामंजूर करने से पहले आयोग द्वारा आवेदक को एक मौका दिया जाना आवश्यक है।

आवेदन की मंजूर हो जाने के बाद, आयोग द्वारा धारा 245 डी (2 बी) के अधीन आयकर आयुक्त से रिपोर्ट मांगी जाती है।

आयोग के रिपोर्ट के आधार पर तुष्ट होकर अथवा जिस तारीख को आयुक्त, आयोग द्वारा भेजे गए पत्र को प्राप्त करता है, उससे 30 दिनों के भीतर यदि आयोग द्वारा आयुक्त की रिपोर्ट प्राप्त नहीं की जाती है। तो धारा 245 डी (2 सी) के अधीन आदेश पारित कर आयोग आवेदन को विधिमान्य घोषित कर सकता है।

आयुक्त को दिए गए 30 दिनों की अवधि की समाप्ति से 15 दिनों के भीतर आयोग द्वारा आदेश  पारित किया जाना है।

धारा 245 डी (2 सी) के अधीन आवेदन को अविधिमान्य घोषित करने से पहले आवेदक को आयोग द्वारा एक मौका दिया जाना आवश्यक है।

जब आवेदन को विधिमान्य मान लिया जाता है तो आयोग द्वारा आवेदन के गोपनीय हिस्से को, आयकर समझौता आयोग (प्रक्रिया) नियम 1997 के नियम 9 के अधीन रिपोर्ट मांगते हुए, आयकर आयुक्त को अग्रसारित कर दिया जाता है।

आयुक्त द्वारा यह रिपोर्ट 45 दिनों के भीतर जमा की जानी होती है। केस के तथ्यों के अनुरूप , यदि आयुक्त अतिरिक्त समय की मांग करता है, तो आयोग द्वारा अतिरिक्त समय की अनुमति दी जा सकती है।

नियम 9 के रिपोर्ट की प्राप्ति पर उसकी एक प्रति आवेदक को, उस पर अपना प्रत्युत्तर प्रस्तुत करने के लिए डाक द्वारा भेज दी जाती है।

आवेदक द्वारा भेजे गए प्रत्युत्तर की एक प्रति आयुक्त के साथ साझा की जाती है।

इसके बाद आयोग के अधिकारियों द्वारा नोटिस जारी कर विशेष दिन को नियत किए गए समय पर सुनवाई तय की जाती है।

सुनवाई के दिन, आवेदक अथवा उसके प्राधिकृत प्रतिनिधि एवं आयकर आयुक्त (अथवा निर्धारण अधिकारी) अथवा उसके प्रतिनिधि अर्थात् आयकर आयुक्त (विभागीय प्रतिनिधि) समझौता आयोग की पीठ के समक्ष उपस्थित होते है। आयोग दोनों पक्षों को और भी कागजात एवं प्रस्तुतियां पेश करने के लिए कह सकता है।

आयोग, आयुक्त को भी और अधिक जांच करने के लिए कह सकता है।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद, आयोग धारा 245 डी (4) के अधीन अंतिम समझौता आदेश, लिखित रूप में पारित करता है। समझौता आदेश, समझौते की शर्तों को बताता है जिसमें अतिरिक्त आयकर  एवं  उस पर ब्याज की राशि एवं उसके भुगतान का तरीका शामिल होता है।

यह आयकर अधिनियम अथवा धनकर  अधिनियम के अधीन शास्ति (जुर्माने) की वसूली अथवा शास्ति (जुर्माना) की माफी का भी प्रावधान करता है।

धारा 245 डी (4) के अधीन पारित आदेश में यदि अभिलेखों के अनुसार कोई स्पष्ट भूल पाई जाती है तो आदेश की तारीख से 6 महीने के भीतर आयोग द्वारा उसे परिशुद्ध किया जा सकता है। पंरतु जहाँ परिशोधन का असर आवेदक की कर –देयता पर पड़ता है वहाँ आवेदक एवं आयुक्त दोनों को उचित अवसर प्रदान किया जाएगा।