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आयकर निपटान आयोग (आई टी एस सी) प्रत्यक्ष करों से संबंधित कर विवादों को हल करने के लिए एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) तंत्र है। वर्तमान में, आयोग के प्रमुख पीठ नई दिल्ली और मुंबई में 6 अतिरिक्त बेंच (दो-दो और चेन्नई और कोलकाता में क्रमश: एक-एक के साथ नई दिल्ली में है।

आय़ोग का गठन, वानचू समिति (1971) की अनुशंसाओं पर 01-04-1976 से प्रभावी हुआ । समिति ने आयोग की कल्पना एक ऐसे तंत्र के रूप में की थी जो एक- बार के कर वंचक अथवा बिना मंशा के कर वंचन करने वाले को समझौता एवं समाधान का अवसर प्रदान करे।

आय़ोग ने अब तक 15000 से अधिक कर विवादों का निपटारा किया है जिसमें विगत 11 वर्षों में निपटाए गए 4778 केस शामिल हैं।

आयोग द्वारा समझौता कराए गए एक केस से आवेदक से संबंधित अनेक प्रकार की कार्यवाहियों जैसे कर निर्धारण, शास्ति (जुर्माना), अभियोजन, कर संग्रह इत्यादि के कई वर्ष तक के मुकदमों में कमी आती है।

आयकर विभाग के निर्धारण – अधिकारी के समक्ष ऐसी प्रत्येक कार्यवाही, आयुक्त (अपील) के एवं बाद में आयकर अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष अपील योग्य होती है,  यदि इसमें कानून संबंधी प्रश्न शामिल होते हैं तो उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय तक भी अपील योग्य होती है। वर्ष 1996 में समझौता आयोग के तंत्र की समीक्षा न्यायमूर्ति डुग्गल के नेतृत्व वाली समिति द्वारा की गई थी जिसने यह पाया कि आयोग उन लक्ष्यों को प्राप्त करने में वास्तविक रूप से सफल रहा है जिनके लिए इसकी स्थापना की गई थी ।

समिति ने यह भी स्वीकार किया कि राजस्व के मामले में आयोग ने संघर्ष से सहमति  के दृष्टिकोण की ओर अग्रसर होने में योगदान किया है।

हाल में, वर्ष 2009 में स्टार  टेलिविजन लिमेटेड के केस का निर्णय सुनाने के दौरान माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सभी क्षेत्रों में पेचीदा केसों, जिनमें राजस्व का फायदा संदेहास्पद होता है, की कर देयता के समाधान में समझौता आयोग के फायदों को रेखांकित किया है।

1. मौजूदा संगठन एवं प्रक्रिया

संगठन

प्रत्येक पीठ एक पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/उपाध्यक्ष) एवं दो सदस्य जो भारतीय राजस्व सेवा के सेवानिवृत अधिकारी होते है, से बनता है। समझौता आयोग में प्रत्येक पीठ को संयुक्त सचिव स्तर के दो वरिष्ठ भा. रा. से. अधिकारियों एक सचिव एवं एक निदेशक (जांच), का सहयोग प्राप्त होता है । सचिव प्रशासनिक सहयोग देता है जबकि निदेशक (जांच) एवं अतिरिक्त निदेशक (जांच) समझौता आवेदन के निपटारे में तकनीकी सहयोग प्रदान करते हैं।

हाल के वैधानिक बदलाव

ऐसे मूल वैधानिक बदलाव जिन्होंने समझौता आयोग की कार्यविधि को प्रभावित किया है निम्न हैं -

समय –सीमा

दिनांक 01-06-2007 के पहले आयोग के लिए समझौता आदेश पारित करने संबंधी कोई समय –सीमा निर्धारित नहीं थी। पंरतु वित्त अधिनियम 2007 ने 01-06-2007 के बाद फाईल किए गए आवेदनों के लिए आयोग द्वारा समझौता आदेश पारित करने के लिए 12 महीनों की समय –सीमा निर्धारित कर दी। वित्त अधिनियम 2010 ने अब 01-06-2010 के बाद दाखिल किए गए आवेदनों के लिए समय सीमा को बढ़ाकर 18 महीने कर दिया है। ( प्रत्यक्ष कर कोड 2010 में भी 18 महीने की समय सीमा प्रस्तावित की गई है। )

आयोग का दायरा

वित्त अधिनियम 2007 ने तलाशी एवं अभिग्रहण मामलों को आय़ोग की परिधि से बाहर कर दिया था। परंतु वित्त अधिनियम 2010 ने पुनः तलाशी एवं अभिग्रहण मामलों को आय़ोग के दायरे में ला दिया है। 01-06-2007 तक आयोग द्वारा केवल उन्हीं केसों को स्वीकार किया जा सकता था। जिसमें घोषित अतिरिक्त आय 1 लाख से अधिक था। वित्त अधिनियम 2007 ने इस सीमा को बढ़ाकर 3 लाख कर दिया । पंरतु वित्त अधिनियम 2010 ने इस सीमा को और अधिक बढ़ा दिया है एवं अब केवल उन्हीं आवेदनों को स्वीकार किया जा सकता है जिनमें अतिरिक्त कर की राशि (रिटर्न में दर्शाए गए आय के अतिरिक्त एवं उससे अधिक) 10 लाख अथवा उससे ज्यादा हो। तलाशी एवं अभिग्रहण के मामलों में इस सीमा को 50 लाख तय किया गया है। यद्यपि वित्त अधिनियम 2011 ने इस सीमा को केवल ग्रुप के मुख्य व्यक्ति के लिए सीमित कर दिया है जहाँ तलाशी कार्य हुआ है (निर्दिष्ट व्यक्ति) जबकि उस ग्रुप के दूसरे केसों के लिए 10 लाख रूपए की सामान्य सीमा लागू होती है। 1. वित्त अधिनियम 2007 ने आवेदक के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि आयोग के समक्ष प्रकट अतिरिक्त आय पर देय कर एवं ब्याज की अदायगी, आवेदन फाईल करने से पूर्व कर दे। अतिरिक्त कर की अदायगी संबंधी प्रमाण के संलग्न न होने की स्थिति में आयोग द्वारा आवेदन नामंजूर किया जा सकता है।

आयोग की कार्य कुशलता

समझौता आयोग आवेदक के संदर्भ में अनेक निर्धारण वर्षों के लिए अनेक कार्यवाहियों का निपटारा निर्णायक रूप से 18 महीनों के भीतर कर देता है। आयोग के आदेश अंतिम एवं निर्णायक होते है। ऐसी प्रत्येक निर्धारण एवं अपील कार्यवाही की सामान्य प्रणाली में, प्रत्येक कार्यवाही में कम से कम पांच वर्ष लग जाते हैं इसके पहले कि कार्यवाहिय़ां निर्णायक रूप से समाप्त हो जाएं।

समझौता तंत्र के द्वारा सामान्य प्रणाली की तुलना में वृद्धिशील राजस्व प्राप्ति भी पर्याप्त रूप से संतोषजनक है।

वित्तीय वर्ष 2010-11 में आयोग ने 400 केसों का निपटारा किया जिसमें 206 करोड़ की कुल रिटर्न आय की तुलना में समझौता की गई कुल राशि 595 करोड़ थी, जो कि रिटर्न की गई कुल आय से 187 प्रतिशत अधिक है।

जहाँ कि सामान्य अपीलीय प्रणाली में अतिरिक्त कर की वसूली अनिश्चित होती है, वहीं समझौता आयोग में आवेदन करने से पहले अतिरिक्त कर की पूरी राशि का भुगतान करना आवश्यक होता है अतः आयोग के समक्ष अदा किए गए कर का शुद्ध वर्तमान मूल्य पर्याप्त रूप से अधिक होता है ।