पीठ की संरचना

सूचना का अधिकार

संपर्क

प्राथमिक संपर्क
ईमेलःinfo@itscdia.gov.in
दूरभाषा सं. – 011-24690693

प्रत्यक्ष कर कोड के अंतर्गत प्रावधान

 प्रत्यक्ष कर कोड बिलः 2010 में समझौता आयोग से संबंधित प्रावधान (नोटः यह बिल अभी संसद द्वारा पास किया जाना हैः नवम्बर 2011 की स्थिति)

  1. समय सीमाः प्र.कर. कोड ने धारा 245 डी (4) के अंतर्गत अंतिम समझौता आदेश पारित करने की समय सीमा आयकर अधिनियम 1961 की तरह ही 18 महीने रखी हैः परंतु भिन्न चरणों के लिए समय –सीमा निम्नानुसार निर्धारित की हैः

     

    आयकर अधिनियम 1961,
    के अधीन

    प्र.कर कोड के अधीन

    धारा 245 डी के अधीन नोटिस जारी करना

    7 दिन

    10 दिन

    धारा 245 डी के अधीन सुनवाई

    10 दिन

    20 दिन

    विधिमान्यता के लिए आयकर आयुक्त की रिपोर्ट

    30 दिन

    45 दिन

    आयकर आयुक्त की अन्य रिपोर्ट
    (प्र.कर. कोड की धारा 276 के अधीन)

    90 दिन

    120 दिन


  2. धारा 290 के उपबन्ध (ख) के अधीन ‘ मामला‘ (केस) की परिभाषा

  3.  कोड धारा 147 के अधीन लंबित कार्यवाहियों को भी शामिल करके समझौता आयोग के कार्यों का दायरा बढ़ाता है।

    परंतु कोड, उन निर्धारण, पुर्ननिर्धारण कार्यवाहियों, जिनके दौरान अभियोजन की कार्यवाही के लिए कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया है, को दायरे से बाहर रखता है।

  4. कोड के अधीन आवेदक, उस निर्धारण वर्ष के लिए समझौता आवेदन नहीं कर सकता है, जिसके लिए उसने रिटर्न फाइल नहीं किया है।

  5. कोड, उस तारीख को परिभाषित नहीं करता है, जिस तारीख से निर्धारण अथवा पुर्ननिर्धारण की कार्यवाही लंबित मानी जा सकती है।

  6. प्रत्यक्ष कर कोड के अनुसार, कोई सदस्य तभी उपाध्यक्ष के रूप में कार्य कर सकता है जबकि उसे उपाध्यक्ष ( के पद पर) नियुक्त किया गया हो, न कि केवल पीठ का वरिष्ठतम सदस्य होने के नाते।

  7. धारा 275 के अधीन आवेदन की मंजूरी

          आयुक्त की रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए दी गई समय सीमा में कोई बदलाव नहीं किया गया है, जो अब भी 15 दिन है।  परंतु कोड आयोग को इस बाबत बाध्य करता है कि जब तक वह आयकर आयुक्त कि रिपोर्ट प्राप्त न कर ले तब तक वह आदेश पारित नहीं कर सकता है। कोड, आयोग द्वारा विधिमान्यता के आदेश पारित किए जाने से पहले, आयुक्त को भी एक अवसर प्रदान करता है।

  8. धारा 276 के अधीन आगे की जांच

    कोड, आयोग को अनुमति देता है कि वह आयोग के समक्ष प्राप्त आवेदन में आयकर आयुक्त द्वारा सुझाए गए मुद्दों पर आयकर आयुक्त को जांच इत्यादि करने का निर्देश जारी करे।

  9. धारा 280 के अधीन कार्यवाहियों का पुनः प्रवर्तन

    टिप्पणीः समझौता के मामले में कार्यवाहियों के पुनः प्रवर्तन

    समझौता के जिस मामले को शून्य मान लिए गया था उनका पुनः प्रर्वतन मंजूरी के चरण से माना गया है जबकि पहले उन्हें आवेदन को आगे की कार्यवाही के लिए अनुमति प्रदान किए जाने के चरण से पुनः प्रवर्तित माना जाता था।

    निर्धारण अधिकारी द्वारा कार्यवाही पूरी किए जाने की अवधि को 24 महीने से घटाकर 21 महीने कर दिया गया है (जिस वित्तीय वर्ष में समझौता शून्य मान लिया गय़ा था, उसकी समाप्ति से)

  10. आयोग की अनन्य अधिकारिता

    प्र.कर कोड के अनुसार, जब तक आवेदन की विधिमान्यता संबंधी आदेश, आयोग द्वारा पारित नहीं किया जाता है तब तक आयोग एवं आयकर आयुक्त की समवर्ती अधिकारिता रहेगी, आदेश पारित किए जाने के पश्चात ही आयोग की अनन्य अधिकारिता शुरू होगी।
    पहले, आयोग की अनन्य अधिकारिता उसी तारीख से प्रारंभ हो जाती थी जिस तारीख को आयोग के समक्ष  आवेदन फाइल की जाती थी।

  11. उत्तरवर्ती आवेदन पर रोक

    प्र.कर कोड उन मामलों में उत्तरवर्ती आवेदन फाइल करने पर रोक लगाती है जिसमें तलाशी एवं अभिग्रहण की कार्यवाही हुई है। और भी , आयकर अधिनियम 1961 के प्रावधानों के जैसे ही, यह उन मामलों, जिनमें समझौता कार्यवाही के दौरान शास्ति (जुर्माना) वसूल किया गया हो अथवा अभियोजन फाइल किया गया हो,  में भी उत्तरवर्ती आवेदन पर रोक लगाती है। परंतु प्र.कर कोड अन्य मामलों ( केस) में उत्तरवर्ती आवेदन फाइल करने की अनुमति प्रदान करता है जबकि आय़कर अधिनियम 1961 के वर्तमान प्रावधान आवेदक को 1 जून 2007 को या उसके पश्चात फाइल किए गए आवेदनों के लिए उत्तरवर्ती आवेदन फाइल करने की अनुमति नहीं देते है।