प्रक्रिया

समझौता आवेदन दायर करने की प्रक्रिया
  • समझौता आवेदन केवल आयकर नियम, 1 9 62 के तहत अधिसूचित निर्धारित फॉर्म संख्या 3-बी में दायर किया जाना है।
  • फॉर्म आवेदक द्वारा खुद पर हस्ताक्षर किए जाने चाहिए।
  • फॉर्म को ठीक से भरना होगा। एक अपूर्ण फॉर्म अस्वीकार करने के लिए उत्तरदायी है।
  • आयोग द्वारा भर्ती होने के लिए, प्रवेश की तारीख तक देय ब्याज के साथ कर की पूरी राशि का भुगतान किया जाना है
  • आवेदन व्यक्तिगत रूप से या पोस्ट द्वारा किया जा सकता है। आवेदक या उसके अधिकृत प्रतिनिधि व्यक्तिगत रूप से आवेदन कर सकते हैं। आवेदन को सचिव को संबोधित पंजीकृत पद द्वारा भी भेजा जा सकता है। हालांकि डाक आवेदन के मामले में, आयोग में प्राप्ति की तारीख को आवेदन की तारीख के रूप में माना जाएगा।
  • आवेदन या तो नई दिल्ली में आयोग के मुख्यालय के सचिव या अतिरिक्त बेंच के सचिव को किया जा सकता है, जिसके अधिकार क्षेत्र में उसका मामला गिरता है या आयोग के अधिकृत अधिकारी को।
  • आयोग द्वारा भर्ती होने के लिए, आवेदन को दाखिल करने की तारीख तक अतिरिक्त कर के भुगतान के प्रमाण (धारा 234 ए, 234 बी और 234 सी के तहत ब्याज सहित) के साथ आवेदन किया जाना चाहिए।
  • आवेदन आवेदक द्वारा कर और ब्याज के भुगतान के समर्थन में साक्ष्य के रूप में स्वयं (-) प्रमाणित चालानों और अन्य दस्तावेजों की एक प्रति के साथ होना चाहिए।
  • निपटान आवेदन व्यक्तिगत रूप से या पंजीकृत पद द्वारा सचिव या बेंच के एक अधिकृत अधिकारी को प्रस्तुत किया जाएगा, जिसके अधिकार क्षेत्र में मामला गिरता है। पद द्वारा भेजे गए एक निपटारे आवेदन को उस दिन प्रस्तुत किया जाएगा जिसे वह आयोग के कार्यालय में प्राप्त किया गया था।
  • एक अधिकृत प्रतिनिधि भी व्यक्तिगत रूप से आवेदन कर सकता है। एक “अधिकृत प्रतिनिधि” का अर्थ आवेदक द्वारा लिखित रूप में अधिकृत व्यक्ति है जो उसकी तरफ से प्रकट होता है:
    • आवेदक से संबंधित व्यक्ति, किसी भी तरीके से, या नियमित रूप से आवेदक द्वारा नियोजित व्यक्ति; या
    • अनुसूचित बैंक के किसी भी अधिकारी जिसके साथ आवेदक एक चालू खाता रखता है या अन्य नियमित लेनदेन करता है; या
    • कोई भी कानूनी व्यवसायी जो भारत में किसी भी नागरिक अदालत में अभ्यास करने का हकदार है; या
    • चार्टर्ड एकाउंटेंट्स एक्ट, 1 9 4 9 (1 9 4 9 का 38) के अर्थ में एक एकाउंटेंट, और किसी भी राज्य के संबंध में, किसी भी व्यक्ति जो कंपनी अधिनियम की धारा 226 के उपधारा (2) के प्रावधानों के आधार पर, 1 9 56 (1 9 56 का 1), उस राज्य में पंजीकृत कंपनियों के लेखा परीक्षक के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त करने का हकदार है।
    • कोई भी व्यक्ति जिसने बोर्ड द्वारा इस ओर मान्यता प्राप्त किसी भी लेखा परीक्षा परीक्षा उत्तीर्ण की है, या
    •  कोई भी व्यक्ति जिसने बोर्ड द्वारा निर्धारित शैक्षणिक योग्यता हासिल की है।
  • उपर्युक्त प्रकृति का कोई दोष होने पर, आवेदन को आवेदक को दोषों को इंगित करने के लिए वापस कर दिया जाता है, इसे हटाने के बाद पुनः जमा करने के लिए। यदि आवेदन ऊपर वर्णित किसी भी दोष से पीड़ित नहीं है, तो उसे रजिस्टर में दर्ज किया जाता है और एक विशिष्ट फ़ाइल नंबर (जिसे पंजीकरण संख्या भी कहा जाता है) आवंटित किया जाता है और आवेदक को पत्र के माध्यम से इसके बारे में सूचित किया जाता है। इसके बाद उद्देश्य के लिए बनाई गई चेक-लिस्ट के अनुसार बारीकी से जांच की जाती है।
  • यदि आवेदन उपरोक्त वर्णित किसी भी दोष से पीड़ित नहीं है, तो उसे रजिस्टर में दर्ज किया गया है और एक विशिष्ट फ़ाइल नंबर (जिसे पंजीकरण संख्या भी कहा जाता है) आयोग के संबंधित खंडपीठ के तकनीकी खंड द्वारा आवंटित किया जाता है। आवेदक को पत्र के माध्यम से इसके बारे में सूचित किया जाता है।

धारा 245 डी(1) के अधीन कार्यवाही के दौरान समझौता आवेदन फाईल करने की तारीख से 14 दिनों के भीतर आयोग द्वारा आवेदन नांमजूर किया जा सकता है।
यदि आवेदन 14 दिनों के भीतर नांमजूर नहीं किया जाता है तो यह मान लिया जाएगा कि इसे मंजूर कर लिया गया है।
आयोग द्वारा आवेदन नांमजूर किया जा सकता है यदि निम्न तीन अनिवार्य शर्तें आवेदक द्वारा पूरी नहीं की जाती हैं-

  1. आयोग के समक्ष अतिरिक्त आयकर प्रकट करना, जो कम से कम रू. 10 लाख हो ( तलाशी और अधिग्रहण मामले में विशिष्ट व्यक्ति के लिए रू. 50 लाख)
  2. आवेदक द्वारा अन्य कोई समझौता आवेदन 1 जून के बाद नहीं किया गया हो, जिसे आगे की कार्यवाही के लिए स्वीकृत कर लिया गया है।
  3. आप जिस निर्धारण वर्ष के लिए आयोग के पास आ रहे है उसके लिए आय़कर प्राधिकारी द्वारा कोई निर्धारण आदेश जारी नहीं किया गया हो एवं उस वर्ष के लिए निर्धारण आदेश जारी करने की वैधानिक समय –सीमा समाप्त नहीं हुई हो

और यह भी कि वह आवेदन जिसके साथ अतिरिक्त कर एवं ब्याज तथा रू 500  की निर्धारित शुल्क की अदायगी का प्रमाण संलग्न नहीं हो, को भी नामंजूर किया जा सकता है।

आवेदन करने की तारीख को , आवेदन की एक प्रति संबंधित आयकर प्राधिकारी को निर्धारित फॉर्म संख्या 34 बी ए में भेजी जानी है, जिसके नहीं भेजे जाने से भी आवेदन नांमजूर किया जा सकता है।

जब आवेदन मंजूर हो जाता है तो धारा 245 (2 बी) के अधीन आयोग द्वारा आयकर आयुक्त की रिपोर्ट मांगी जाती है।

आयुक्त के रिपोर्ट के आधार पर आयोग तुष्ट होकर अथवा आयुक्त द्वारा पत्र प्राप्त किए जाने से 30 दिनों के भीतर यदि आयुक्त की रिपोर्ट प्राप्त नहीं होती है, तो आयोग धारा 245 डी (2 सी) के अधीन एक आदेश पारित कर आवेदन को वैध घोषित कर सकता है।

आयुक्त को दिए गए 30 दिनों की अवधि की समाप्ति से 15 दिनों के भीतर आयोग द्वारा आदेश पारित किया जाना है।

धारा 245 डी (1) के अधीन आवेदन नामंजूर करने से पहले आयोग द्वारा आवेदक को एक मौका दिया जाना आवश्यक है।

आवेदन की मंजूर हो जाने के बाद, आयोग द्वारा धारा 245 डी (2 बी) के अधीन आयकर आयुक्त से रिपोर्ट मांगी जाती है।

आयोग के रिपोर्ट के आधार पर तुष्ट होकर अथवा जिस तारीख को आयुक्त, आयोग द्वारा भेजे गए पत्र को प्राप्त करता है, उससे 30 दिनों के भीतर यदि आयोग द्वारा आयुक्त की रिपोर्ट प्राप्त नहीं की जाती है। तो धारा 245 डी (2 सी) के अधीन आदेश पारित कर आयोग आवेदन को विधिमान्य घोषित कर सकता है।

आयुक्त को दिए गए 30 दिनों की अवधि की समाप्ति से 15 दिनों के भीतर आयोग द्वारा आदेश  पारित किया जाना है।

धारा 245 डी (2 सी) के अधीन आवेदन को अविधिमान्य घोषित करने से पहले आवेदक को आयोग द्वारा एक मौका दिया जाना आवश्यक है।

जब आवेदन को विधिमान्य मान लिया जाता है तो आयोग द्वारा आवेदन के गोपनीय हिस्से को, आयकर समझौता आयोग (प्रक्रिया) नियम 1997 के नियम 9 के अधीन रिपोर्ट मांगते हुए, आयकर आयुक्त को अग्रसारित कर दिया जाता है।

आयुक्त द्वारा यह रिपोर्ट 45 दिनों के भीतर जमा की जानी होती है। केस के तथ्यों के अनुरूप , यदि आयुक्त अतिरिक्त समय की मांग करता है, तो आयोग द्वारा अतिरिक्त समय की अनुमति दी जा सकती है।

नियम 9 के रिपोर्ट की प्राप्ति पर उसकी एक प्रति आवेदक को, उस पर अपना प्रत्युत्तर प्रस्तुत करने के लिए डाक द्वारा भेज दी जाती है।

आवेदक द्वारा भेजे गए प्रत्युत्तर की एक प्रति आयुक्त के साथ साझा की जाती है।

इसके बाद आयोग के अधिकारियों द्वारा नोटिस जारी कर विशेष दिन को नियत किए गए समय पर सुनवाई तय की जाती है।

सुनवाई के दिन, आवेदक अथवा उसके प्राधिकृत प्रतिनिधि एवं आयकर आयुक्त (अथवा निर्धारण अधिकारी) अथवा उसके प्रतिनिधि अर्थात् आयकर आयुक्त (विभागीय प्रतिनिधि) समझौता आयोग की पीठ के समक्ष उपस्थित होते है। आयोग दोनों पक्षों को और भी कागजात एवं प्रस्तुतियां पेश करने के लिए कह सकता है।

आयोग, आयुक्त को भी और अधिक जांच करने के लिए कह सकता है।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद, आयोग धारा 245 डी (4) के अधीन अंतिम समझौता आदेश, लिखित रूप में पारित करता है। समझौता आदेश, समझौते की शर्तों को बताता है जिसमें अतिरिक्त आयकर  एवं  उस पर ब्याज की राशि एवं उसके भुगतान का तरीका शामिल होता है।

यह आयकर अधिनियम अथवा धनकर  अधिनियम के अधीन शास्ति (जुर्माने) की वसूली अथवा शास्ति (जुर्माना) की माफी का भी प्रावधान करता है।

धारा 245 डी (4) के अधीन पारित आदेश में यदि अभिलेखों के अनुसार कोई स्पष्ट भूल पाई जाती है तो आदेश की तारीख से 6 महीने के भीतर आयोग द्वारा उसे परिशुद्ध किया जा सकता है। पंरतु जहाँ परिशोधन का असर आवेदक की कर –देयता पर पड़ता है वहाँ आवेदक एवं आयुक्त दोनों को उचित अवसर प्रदान किया जाएगा।